Monday, 5 March 2018

कान दर्द की दवा

सिद्ध अयूर्वादिक

                  कान दर्द की दवा



मेथी के दाने    5 ग्राम
लहसुन कली    5 पीस
नीम पत्ती          5 पीस
प्याज               2 ग्राम
अजवाइन         2 ग्राम
अदरक            2 ग्राम

सभी को

200 ग्राम  जैतून तेल में डाल कर गरम करे और ठंडा होने के बाद इसे छान कर कान में डालने से दर्द से तुरंत आराम मिलता है।

दिन में 3 से 5 बार कान डालते रहे।

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यह भी कर सकते है

       कान में दर्द का आयुर्वेदिक उपचार

1. चाहे कितना भी कान दर्द हो केले के तने का रस निकल कर सोने से पहले रात को कान में डाले। इस उपाय को करने से सुबह तक कान में होने वाले दर्द से राहत मिल जाएगी। कान से जुड़े दूसरे रोगों के इलाज में भी ये उपाय काफ़ी कारगर है।

2. घी में मुलेठी को हल्का गरम करे और कान के आस पास इसका लेप लगाये। इस नुस्खे से दर्द में आराम मिलता है।

3. अजवाइन का तेल सरसों के तेल में मिलाकर गुनगुना करे और कान में डाले। अजवाइन तेल सरसों के तेल का तीसरा भाग होना चाहिए।


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◆साइनस की दवा◆

सिद्ध अयूर्वादिक
                ◆साइनस की दवा◆


गिलोय चुर्ण    100 ग्राम
त्रिफला चुर्ण    100 ग्राम
चरायता           50 ग्राम
हल्दी                50 ग्राम
दालचीनी          50 ग्राम
जीरा                 50 ग्राम
मेथी भुनी          50 ग्राम
सोंठ                  50 ग्राम
तुसली पंचाग      50 ग्राम
सभी को चुर्ण मिला ले।
सेवन विधि - दिन में 3 बार गर्म पानी से 1 -1 चम्मच लेते रहे।
41 दिन का कोर्स करे।
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परहेज और आहार
लेने योग्य आहार
संक्रमण के दौरान सीमित मात्रा में खाएँ, आहार में साबुत अनाज, फलियाँ, दालें, हलकी पकी सब्जियाँ, सूप, और शीतलन की प्रक्रिया से बने तेल (जैतून का तेल)
शिमला मिर्च, लहसुन, प्याज़, और हॉर्सरैडिश अपने सूप और आहार में शामिल करें, ये अतिरिक्त म्यूकस को पतला करके निकलने में सहायक होते हैं।
अच्छी तरह साफ पानी अधिक मात्रा में पियें।
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इनसे परहेज करें
म्यूकस बनाने वाले आहार जैसे कि मैदे की चीजें, अंडे, चॉकलेट्स, तले और प्रोसेस्ड आहार, शक्कर और डेरी उत्पाद, कैफीन, और शराब
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साइनसाइटिस और साइनस संक्रमण के प्रकार
साइनसाइटिस को कई प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है, जिसमें संक्रमण रहने की अवधि (तीव्र, कम तीव्र या लंबे समय से), सूजन (संक्रामक या असंक्रामक) आदि शामिल हैं -
1) तीव्र साइनस संक्रमण (Acute sinus infection; कम समय तक रहने वाला) - आम तौर पर शरीर में इसका संक्रमण 30 दिन से कम समय तक ही रह पाता है।
2) कम तीव्र साइनस संक्रमण (Sub acute sinus infection) - इसका संक्रमण एक महीने से ज्यादा समय तक स्थिर रह सकता है मगर 3 महीने से ज्यादा नहीं हो पाता।
3) क्रॉनिक साइनस संक्रमण (Chronic sinus infection; लंबे समय तक रहने वाला) - यह शरीर में 3 महीने से भी ज्यादा समय तक स्थिर रह सकता है। क्रॉनिक साइनसाइटिस आगे उप-वर्गीकृत भी हो सकता है, जैसे
क्रॉनिक साइनसाइटिस नाक में कणों (polyps) के साथ या उनके बिना
एलर्जिक फंगल साइनसाइटिस
4) रीकरंट साइनसाइटिस (Recurrent Sinusitis; बार-बार होने वाला) यह तब होता है जब किसी व्यक्ति पर प्रतिवर्ष कई बार संक्रमण का प्रभाव होता है।
संक्रमित साइनसाइटिस आम तौर पर सीधे वायरस संक्रमण से होता है। अक्सर बैक्टीरिया की वृद्धि के कारण साइनस संक्रमण या फंगल साइनस संक्रमण भी हो सकता है लेकिन ये बहुत ही कम हो पाता है। कम तीव्र साइनस संक्रमण (Sub acute sinus infection) और क्रॉनिक साइनस संक्रमण (chronic infection) ये दोनों तीव्र साइनस संक्रमण (acute sinus infection) के अधूरे इलाज का परिणाम होते हैं।
असंक्रामक साइनसाइटिस जलन और एलर्जी के कारण होता है, जो तीव्र, कम तीव्र औऱ क्रॉनिक साइनस संक्रमण को सामान्य साइनस संक्रमण के रूप में अनुसरण करता है।
★★★

साइनस शब्द का हिन्दी अर्थ विवर या कोटर होता है। ये हडि्डयों के अन्दर वाले खोल या गहृर होते हैं।
उदाहरण के लिये ऊर्ध्वहनु की हड्डी का विवर तथा नाक का वह विवर जो माथे के नीचे अन्दर की ओर पाया जाता है।

जब कभी इन विवरों में प्रदाह (जलन) होती है तो उसे ही साइनस की प्रदाह या विवरशोथ नाम से जाना जाता है। वैसे मनुष्य के शरीर में कई सारे विवर पाये जाते है जैसे- ललाटविवर (फरनटल साइनस), ऊर्ध्वहन्वास्थि विवर (मैकसीलैरी साइनस), गोल विवर (लैफनाओइड साइनस), झर्झर विवर (ऐथमोइड साइनस )। मनुष्य के शरीर में जब कभी इन सभी विवरों के कारण जलन की अवस्था प्रकट होती है तो उसे साइनस की प्रदाह कहते हैं। ये सारे विवर नाक तथा उसकी आस-पास की हडि्डयों में पाए जाते हैं। इस रोग से पीड़ित रोगी को सर्दी-जुकाम, नाक बंद होना, माथे पर हल्का-हल्का दर्द रहना, बार-बार छींके आना तथा बुखार जैसी अवस्थाएं घेर लेती है। रोगी के विवर को दबाने पर दर्द हो सकता है।
कारण-
        इस प्रकार का रोग विवरशोथ में ठंड लग जाने के कारण, इन्फ्लुएंजा रोग के कारण या दांत में फोड़ा होने के कारण भी हो सकता है।

सिद्ध अयूर्वादिक
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