Saturday, 28 December 2019

आहार शुद्धि से प्राणों के सत की शुद्धि होती है। कैसे करे आहार शुद्धि??

सिद्ध अयुर्वेदिक

    आहार शुद्धि से प्राणों के सत
           की शुद्धि होती है।


सत्व शुद्धि से स्मृति निर्मल और स्थिरमति (जिसे प्रज्ञा कहते हैं) प्राप्त होती है। स्थिर बुद्धि से जन्म-जन्मांतर के बंधनों और ग्रंथियों का नाश होता है और बंधनों और ग्रंथियों से मुक्ति ही मोक्ष है। अत: आहार शुद्धि प्रथम नियम और प्रतिबद्धता है।

आहार केवल मात्र वही नहीं जो मुख से लिया जाए, आहार का अभिप्राय है स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर को पुष्ट और स्वस्थ रखने के लिए इस दुनिया से जो खाद्य लिया जाए।

1. कान के लिए आहार है शब्द या ध्वनि।
2. त्वचा के लिए आहार है स्पर्श।
3. नेत्रों के लिए आहार है दृश्य या रूप जगत।
4. नाक के लिए आहार है गंध या सुगंध।
5. जिह्वा के लिए आहार है अन्न और रस।
6. मन के लिए आहार है उत्तम विचार और ध्यान।

अत: ज्ञानेन्द्रियों के जो 5 दोष हैं जिससे चेतना में विकार पैदा होता है, उनसे बचें।

जागे और देखे आप कैसा आहार लें रहे हैं क्या वो विष तो नही है। आप का ज्ञान आप को मुक्त करेगा। खुद चेतन हो  चेतना के जगत को प्राप्त हो।

        ईशा उपनिषद पहला वाक्य -
दास
अयुर्वेदिक वैद्य आचार्य
स्वामी वीत दास
78890 53063
94178 62263

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